महादेव की अजब बारात


काल विकराल क्या औघड़ रूप बनाये हो 
आँखें है लाल और ऊपर से भांग भी चढाये हो 
भैरों द्वारे ठाड़े प्रेतन की सेना लै, 
   नंदी को भी आज युद्ध के खातिर सजाये हो
त्रिशूलन को धार दै दै भृंगी श्रृंगी सज्ज खड़े
काली के खाली खप्पर से आज मृत्यु को डराये हो 
हे महाकाल आज काहे इतनो गुस्साये हो 
  
 अरे चूक हुई हमसे
नारद के गान से लागत है कुछ और ही 
युद्ध नहीं, कही और ही आज कदम बढ़ाये हो
राजा हिमाचल द्वारे बाजत शहनाई है 
लागत कोई शुभ घड़ी आयी हो 
हम अज्ञानी ऐसे तुम्हरी बारात को सेना समझ गये
का करे तुम रूप ही ऐसा बनाये हो 
दूल्हा तो तुम लागत नाही, 
जयमाल नाही मुण्डमाल लटकाये हो
भूतन प्रेतन से तुम्हरी यारी 
तुम का जानौ दुनियादारी
उन्हीं कै जैसे अपना भोला मुखड़ा सजाये हो
गौरा महल की रहनवारी औ' तुम कैलाशी 
समझ ही ना आवत काहे ब्याह रचाये हो
अरे बुलाओ इन्द्र देवता का मेघन के संग
ना जाने कब से नहीं नहाये हो
दूल्हा के आभूषण लै लक्ष्मी द्वारै ठाड़ी 
इन गणन का राह से काहे नाही हटाये हो 
सरस्वती सोहर गा रही हर के आगे 
और तुम बैठे चिलम सुलगाये हो 
 देर काहे करत हो, मुहूरत का समय होवत 
वहाँ हिमाचल सारे जग का न्योता पठाये हो

राक्षस पिशाच देव गन्धर्व सारे है नाच रहे 
जो तुम अपन डमरू झूम के बजाये हो 
तुम हो कि मानत नाही, साज सज्जा के संग
भांग धतूर की पोटली काहे फसाये हो 
सावधान! हिमाचल का द्वार अब दिख रहा  
सभ्य बनो, अपने ही पाणिग्रहण में आये हो 
अरे रोको भैरों औ' वानरो को, हमरी सुनत नाहीं 
पूरी बारात मे खूब आतंक मचाये हो 
मैना रानी आरति लै ठाड़ी घी और कपूर की 
और तुम यहाँ गांजा सुलगाये हो 
राजकुमारी सारी दौड़ दौड़ भाग रही 
गले मे तो डारे ही हो साँप झोरिया मे भर लाये हो
भेष योगी का अब तो त्यागो महाराज 
योग सभा नही अपने विवाह में पधारे हो
तनिक देखो कोई मेल दिखता नाही
पार्वती को देखो और खुद की ओर निहारो 
विनती सुनो मेरी विकराल रूप छोड़ो
गंग भंग को हटा, श्रृंगार कर मुख तो सुधारो 
मन मोह लिए हो अब अपने नये रूप से
शशि माथे धर कर, चंद्रशेखर रूप अवतारे हो
मोहिनी मुस्कान इस सुन्दर रूप पर डारि के
जादू मोह का सब के नैनन पर डारे हो 
नजर ना लागे हमरी तुमका हे त्रिलोचन
मोह से हमरी तुम मति ही मारे हो
ब्याहो पहाड़ की पुत्री को और जाओ कैलाश को
गिरिजापति बन, हमरे मुख पर तुम ताले डारे हो

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