काल विकराल क्या औघड़ रूप बनाये हो आँखें है लाल और ऊपर से भांग भी चढाये हो भैरों द्वारे ठाड़े प्रेतन की सेना लै, नंदी को भी आज युद्ध के खातिर सजाये हो त्रिशूलन को धार दै दै भृंगी श्रृंगी सज्ज खड़े काली के खाली खप्पर से आज मृत्यु को डराये हो हे महाकाल आज काहे इतनो गुस्साये हो अरे चूक हुई हमसे नारद के गान से लागत है कुछ और ही युद्ध नहीं, कही और ही आज कदम बढ़ाये हो राजा हिमाचल द्वारे बाजत शहनाई है लागत कोई शुभ घड़ी आयी हो हम अज्ञानी ऐसे तुम्हरी बारात को सेना समझ गये का करे तुम रूप ही ऐसा बनाये हो दूल्हा तो तुम लागत नाही, जयमाल नाही मुण्डमाल लटकाये हो भूतन प्रेतन से तुम्हरी यारी तुम का जानौ दुनियादारी उन्हीं कै जैसे अपना भोला मुखड़ा सजाये हो गौरा महल की रहनवारी औ' तुम कैलाशी समझ ही ना आवत काहे ब्याह रचाये हो अरे बुलाओ इन्द्र देवता का मेघन के संग ना जाने कब से नहीं नहाये हो दूल्हा के आभूषण लै लक्ष्मी द्वारै ठाड़ी इन गणन का राह से काहे नाही हटाये हो सरस्वती सोहर गा रही हर के आगे...