शहीद का घर

आज गाँव में पसरा था सन्नाटा
शोर तो इक घर में था
आंगन में भीड़ जमा थी बीच में था कोई लेटा
वो था नहीं और कोई, वो था भारत का बेटा
खाकर गोली छाती पर प्राण थे उसने त्याग दिये
कायर नहीं था वो, मरने से पहले ना जाने कितने दुश्मन के थे शिकार किये
फाड़ छाती दुश्मन की उसने था लहू पिया
देकर अपनी सांसों को उसने आज नाम अमर किया
दुश्मन की तोपों को जो करता था खामोश
आज वो खामोश हुआ
माँ का आँचल आँसुओं से था भीगा
पास ही में बैठी थी इक नवविवाहित विधवा
सबका दुख अपार था, परन्तु एक बूढ़ा ऐसा भी था जो गौरवान्वित हो चौड़ा होकर बैठा था
पूछने पर पता चला शहीद उसी का बेटा था
आज फिर एक गरीब ने अपनी सारी दौलत देश पर लुटा दी
उसके बेटे ने देश की शान बढ़ा दी
किंचित उसके बूढ़े कंधों पर भार बहुत होगा
उसको तो भी अपने बेटे से प्यार बहुत होगा
माँ तो रो कर अपना दिल हल्का कर लेगी
बूढ़ा अंदर ही अंदर मरेगा
उस घर के दीपक के बुझने से अंधकार तो बहुत होगा
पर उस दीपक ने रौशन देश को किया उसका स्वर्ग में सत्कार बहुत होगा
उसकी कुर्बानी व्यर्थ न जायेगी
बनकर प्रेरणा देश का गौरव बढ़ायेगी

Comments

Popular posts from this blog

अंधविश्वास का विज्ञान

खोज रौशनी की

समय: इक सोच