अधिकार
भारतः एक ऐसा देश जहाँ का लोकतंत्र सबसे बड़ा और नागरिकों को जितने अधिकार मिले है शायद ही कोई और देश दे पाएगा। जब अधिकार मिलते है तो उसके साथ ही आती है बड़ी जिम्मेदारियाँ। अब ये हमारे बुद्धि विवेक पर है कि हम कैसे अपने अधिकारों का प्रयोग करते है। जिनमें से एक प्रमुख अधिकार है अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जो कि बहुत जरूरी है किसी भी स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक के लिए। परन्तु स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि आप किसी और की स्वतंत्रता में दखल दे। मैंने कहीं पढ़ा था कि आपकी स्वतंत्रता की सीमा वही तक है जहाँ से दूसरे की सीमा प्रारम्भ होती है। सीमा का दायरा काल्पनिक और अदृश्य जरूर है परन्तु प्रभावी है, इतनी सारी स्वतंत्रता तथा इतने अधिकार कुछ लोगों से संभाले नहीं जाते अतः वह उनका दुर्प्रयोग करने लगते है। ऐसी बातें किसी कम पढ़े लिखे व्यक्ति से हो तो भूल समझकर क्षमा किया जा सकता है परन्तु जब यही कार्य देश विदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों से संबन्धित बुद्धिजीवी लोग करते है तो उनके मानसिक संतुलन पर संदेह होने लगता है और आजकल तो यह प्रतिदिन की चर्चा का विषय बन गया है। कभी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी देश के सैन्य प्रमुख पर अपने कुविचार प्रकट करते है तो कोई अपनी राजनीति चमकाने हेतु देश का अपमान करने से भी नहीं चूकते। इनको इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि इनके कुकृत्यों से देश की अखंडता संकट में है। इनको किसी जाति, धर्म, रंग, से कोई संबंध नहीं, ये सब एक मोहरा है जातिगत उपद्रव को बढ़ावा देने के लिए। इक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाना और किंकर्तव्यविमूढ़ होना अच्छा नेता होने की निशानी है
समझ के परेह है ऐसे अधिकार जो दूसरों के अधिकार छीन ले। अधिकार सबको चाहिए परन्तु उनकी गरिमा बनाये रखना सबके वश की बात नहीं है। स्वतंत्रता आवश्यक है सबका मौलिक अधिकार है ये परन्तु ऐसी कैसी स्वतंत्रता जो दूसरों की स्वतंत्रता पर खतरा बनें। आपको बोलने की स्वतंत्रता है पर आपके विचार दूसरों पर कैसा प्रभाव करेंगे उनकी स्वतंत्रता पर कोई आघात तो नहीं है यह सोचना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी होना चाहिए। इक बार सोचियेगा जरूर कि अधिकारों पर भी कुछ अंकुश हो तो शायद परिस्थितियाँ बदले, देश में फैली असहिष्णुता, अशांति पर भी अंकुश लगेगा। सोचियेगा जरूर.......
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